ब्रिटिश साम्राज्यवाद से आज़ादी के लिए भारत की जनता को करीब दो सौ साल तक संघर्ष करना पड़ा था। इस लंबे संघर्ष में देश के सभी वर्गों, धर्मों, जातियों व समुदायों के लोगों ने अपने ढंग से हिस्सा लिया और कुर्बानियां दीं। उनके लगातार संघर्ष और बलिदानों के कारण आखिरकार 15 अगस्त,1947 को देश आज़ाद हुआ। लेकिन कुछ ऐसे संगठन और उनके नेता भी थे, जो न केवल इस लड़ाई से अलग रहे थे बल्कि उन्होंने अंग्रेज सरकार का साथ भी दिया था। उन्होंने विदेशी राज के विरुद्ध संघर्षरत जनता की एकता और भाईचारे में धर्म के नाम पर सांप्रदायिक उन्माद पैदा कर आज़ादी की लड़ाई को कमज़ोर करने की कोशिश की थी।
आगे चलकर उसी उन्माद के कारण देश के भारत और पाकिस्तान के रूप में दो टुकड़े हुए। फिर उसी की वजह से भड़की सांप्रदायिक हिंसा के कारण लाखों निर्दोष हिंदू, सिख और मुसलमानों को अपने जान-माल से हाथ धोकर बेघरबार होना पड़ा था। इसके लिए इधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा के नेता जिम्मेदार थे, तो उधर मुस्लिम लीग और उसके नेता। आरएसएस के नेता एमएस गोलवलकर और हिन्दू महासभा के नेता विनायक दामोदर सावरकर देश को एक हिंदू राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे, तो मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना मुसलमानों के लिए एक अलग वतन यानि पाकिस्तान के रूप में।
ब्रिटिश सरकार द्वारा बीसवीं शताब्दी के अंत में सार्वजनिक किए गए कुछ गुप्त दस्तावेजों से पता चलता है कि हिन्दुस्तान के विभाजन का फैसला लंदन में बैठे ब्रिटिश रणनीतिकारों ने सन् 1939 में ले लिया था। लेकिन धर्म के आधार पर उसका बीज तो हिंदू महासभा के नेता विनायक दामोदर सावरकर ने सन 1937 में ही बो दिया था। ऐसा उन्होंने देश में मौजूद दो बड़े धार्मिक समुदायों, हिंदू और मुसलमान, को एक-दूसरे से विपरीत आस्था वाले दो अलग राष्ट्र बताकर ‘द्वि राष्ट्र’ का अपना सिद्धांत पेश करके पहले ही कर दिया था। उनका यह सिद्धांत देश पर राज कर रही अंग्रेज सरकार की ‘बांटो और राज करो’ नीति के एकदम अनुकूल था। शायद इसके कारण ही उसने सावरकर को 60/- रुपए महीने की पेंशन लगाई थी, जो देश आज़ाद होने तक जारी रही थी।
विभाजन के बाद पाकिस्तान तो धर्म आधारित शासन की ओर बढ़ा, लेकिन भारत के दूरदर्शी नेताओं ने देश की सभ्यता, सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य की स्थापना की ओर कदम उठाए। उसके लिए 1946 में जो संविधान सभा गठित की गयी, उसमें बीआर अंबेडकर को भी शामिल किया गया था। उन्हें उस समिति का अध्यक्ष बनाया गया था, जिसका दायित्व संविधान का प्रारूप तैयार करना था।
अंबेडकर आधुनिक विचारों में यकीन रखने वाले चिंतक थे। गांधी, नेहरू आदि की तरह वे भी धर्मनिरपेक्षता, स्वतंत्रता और समानता में यकीन करते थे। वे भी चाहते थे कि देश के संविधान का आधार धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय हो। इन्हीं मूलभूत सिद्धांतों के आधार पर संविधान का प्रारूप तैयार किया गया, जिसे विस्तृत बहस के बाद संविधान सभा ने 26 नवंबर, 1949 को स्वीकार किया।
26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने के साथ भारत ने अपने को संप्रभु धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणतंत्र घोषित कर भारतीय इतिहास में एक नये युग की शुरुआत थी। जिस संविधान के अंतर्गत भारत धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणतंत्र बना, उसमें सर्वोच्च सत्ता स्वयं भारत की जनता थी, जिसने अपने को यह संविधान प्रदान किया था।
संविधान की नज़र में प्रत्येक भारतीय नागरिक चाहे उसका धर्म, उसकी जाति, उसकी नस्ल, उसकी भाषा कुछ भी क्यों न हो, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष या वह हिंदुस्तान के किसी भी इलाके का रहने वाला क्यों न हो, सब बराबर थे और सबको समान अधिकार हासिल थे। स्वतंत्रता, समानता और पारस्परिक भाईचारे के सिद्धांत पर इस लोकतांत्रिक गणतंत्र की नींव रखी गयी थी, जिसकी सबसे बड़ी पहचान धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावादी संस्कृति थी।
परंतु स्वतंत्रता आंदोलन से अलग रहकर अंग्रेजों की सेवा करने वाले और राजे-रजवाड़ों के समर्थक हिंदू महासभा, आरएसएस जैसे संगठनों के नेता भारत में संविधान सभा द्वारा इस तरह के संविधान के निर्माण के पक्ष में बिलकुल नहीं थे।
1947-48 के दौरान संघ के मुख पत्र ऑर्गेनाइजर, गीता प्रेस से निकलने वाली पत्रिकाएं और किताबें तथा कथित साधु-संत सब इस तरह के संविधान निर्माण के सख्त विरोधी थे। उनका कहना था कि जब हमारे पास मनुस्मृति जैसा एक महानग्रंथ पहले से ही मौजूद है, तो यूरोपीय जीवन मूल्य पर आधारित लोकतंत्र भारत की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास की धारा को उसके सही रूप में अभिव्यक्त नहीं करेगा। इस आधार पर उस समय उन्होंने पूरी तरह संविधान को अस्वीकार कर दिया था।
भारतीय संविधान का विरोध और सत्ता में आने पर उसे हटाने का मुद्दा भी आरएसएस के एजेंडे में 1949 से ही है, जब संविधान सभा द्वारा उसे पारित किया गया था। उस समय के अखबारों में छपे आरएसएस नेताओं के बयान देखे जा सकते हैं, जिनमें कहा गया था कि “भारतीय संविधान में भारतीय जैसा कुछ भी नहीं है।“
आरएसएस के मुखपत्र ‘दि आर्गेनाइजर’ के 30 नवम्बर, 1949 के अंक में संविधान के विरोध में जो सम्पादकीय छपा था, उसमें कहा गया था कि “भारत के नए संविधान के बारे में सबसे खास बात यह है कि इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे भारतीय कहा जाए। इसमें न भारतीय कानून हैं, न भारतीय संस्थाएं हैं, न शब्दावली और पदावली हैं। इसमें प्राचीन भारत के मनु के कानूनों का उल्लेख नहीं है, जिन्होंने दुनिया को प्रेरित किया है। किन्तु हमारे संवैधानिक पंडितों (आंबेडकर और नेहरू) के लिए उनका कोई अर्थ नहीं है।”
यह विरोध लिखने और बोलने तक ही सीमित नहीं था बल्कि उसके विरोध में आरएसएस ने प्रदर्शन भी किये थे और दिल्ली में संविधान के पन्ने फाड़ने के अलावा आंबेडकर का पुतला भी फूंका था। वास्तव में आरएसएस की मुख्य चिंता मनुस्मृति है, जिसका कोई कानून, कोई संस्था और कोई शब्दावली भारतीय संविधान में नहीं ली गई है। 1950 के बाद के दशकों में ही नहीं बल्कि इक्कीसवीं सदी के दशकों में भी आरएसएस और भाजपा के नेताओं के स्वर भारतीय संविधान के समर्थन में कभी नहीं रहे। उन्होंने हर अवसर पर इसका विरोध किया है। लेकिन मौका मिले, तो इसकी शपथ लेकर सत्ता संभालने में उन्हें कोई ऐतराज नहीं होता।
(अवतार सिंह जसवाल वामपंथी लेखक और कार्यकर्ता हैं।)